अहोई अष्टमी: इस विधि से करें निर्जला व्रत, जानिए क्या है शुभ मुहूर्त

अहोई अष्टमी का व्रत को हर महिला अपने बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए कामना करती हैं
करवा चौथ के चार दिन बाद अहोई अष्टमी व्रत का त्योहार होता है. अहोई अष्‍टमी संतान की मनोकामना का दिन होता है. इस दिन संतान के लिए लंबी आयु और सुख-समृद्धि मांगी जाती है.

किसके लिए रखा जाता है व्रत?
इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन व्रत रखा जाता है. उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान में महिलाएं बड़ी निष्ठा के साथ इस व्रत को करती हैं. इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं घर की दीवार पर अहोई का चित्र बनाती हैं.
संतान की सलामती से जुड़े इस व्रत का बहुत महत्व है. इस व्रत को हर महिला अपने बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए करती हैं. कुछ महिलाएं इस व्रत को बच्चे की प्राप्ति के लिए भी करती हैं.
इस व्रत की क्या है मान्यता?
कहा जाता है कि अहोई अष्टमी का व्रत करने से अहोई माता खुश होकर बच्चों की सलामती का आशीर्वाद देती हैं. इस बार अहोई अष्टमी व्रत 12 अक्टूबर को है. इस व्रत में महिलाएं तारों और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोलती हैं.
अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी दिवाली से सिर्फ 7 दिन पहले मनाई जाती है. या यूं कहे कि ये व्रत करवा चौथ के 4 दिन बाद मनाया जाता है.

अहोई व्रत 2017 का शुभ मुहूर्त
सुबह: 6.14 से 7.28 बजे तक
शाम: 6.39 बजे से शुरू

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि
- सुबह उठकर स्नान कर निर्जला व्रत करें.
-  सूरज ढलने के बाद अहोई पूजा की जाती है.
-  पूजा के दौरान अहोई कलेंडर और करवा लेकर पूजा करें.
-  कथा सुननें के बाद अहोई की माला दिवाली तक पहननी चाहिए.
अहोई अष्टमी पर कैसे करे पूजा?
उसमें 8 कोष्ठक वाली एक पुतली बनाती हैं. कुछ जगहों पर दीपावली के पूजन के लिए कुछ प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं. पुतली के पास ही स्याऊ माता और उनके बच्चों की तस्वीर बनाई जाती है. उसके बाद जमीन पर चौक पूरकर पीले रंग से रंगे हुए कलश की स्थापना की जाती है. इसके बाद कच्ची रसोई बनाकर उसे भोग के लिए एक बड़े थाल में सजाया जाता है.
क्या करें कलश पूजन के बाद?
कलश की पूजा अर्चना के बाद दीवार पर बनाई गई अहोई और स्याऊ माता की पूजा कर उन्हें दूध और भात का भोग लगाया जाता है. फिर शाम के वक्त चंद्रमा को अर्घ्य देकर कच्चा भोजन किया जाता है और इस व्रत की कथा सुनी जाती है.
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